डिस्किलेमर इमदाद रोहानी – 1
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डिस्किलेमर इमदाद रोहानी – 2
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” इमदाद रोहानी ” वह जमाअत है जहाँ हम आयाते क़ुरआनी व फरमाने नबवि स० के मुताबिक़ मरीज़ों को शिफा पहुँचाने के लिए मुमकिन कोशिश करने का यक़ीन दिलाते हैं
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रूपये से ताल्लुक़ इमदाद रोहानी का नज़रयह
अमल शुरू करने से पहले रक़म की अदाईगी को ” इमदाद रोहानी ” अमली ज़कात तसव्वुर करती है | ” इमदाद रोहानी ” सदक़े कि रक़म को भी गुफ्तुगू के एतबार से अमली ज़कात ही कहता है | इमदाद रोहानी का यह नज़रयह हे के किसी भी अमल को शुरू करने से क़ब्ल अगर बह निय्यत सदक़ह रक़म की अदाईगी नहीं की जाए तो किया हुआ कोई भी अमल आप को फायदह नहीं दे सकती है | इलावा ” इमदाद रोहानी ” हर शख़्स का इलाज से ताल्लुक़ रक़म अदाईगी का एक हद भी ” इमदाद रोहानी ” बहेसियते मरीज़ मुक़र्रर करता है | और ” इमदादे रोहानी ” का यह नज़रयह भी हे की गर मुक़र्ररह रक़म से कम की अदाईगी की सूरत में भी अमल से आप को कुछ फायदह नहीं होगा | इन के इलावा ” इमदाद रोहानी ” यह नज़रयह भी रखती है के आप ” इमदाद रोहानी ” के इलावा कहीं और अगर रक़म की अदाईगी करते हैं तो एसी सूरत में आप को रक़म दोगनी अदा किये बग़ैर अमल आप को फायदह नहीं दे सकती है | क्यों की जहां आप रक़म की अदाईगी करते हैं बसा औक़ात आप का रक़म सहीह जगह वक़्फ नहीं हो पाता एसी सूरत में दोगनी रक़म आप का कुफ्फारह के तौर पर वह पहली रक़म ” इमदाद रोहानी ” क़ुबूल तसव्वुर करती है | या अगर आप ” इमदाद रोहानी ” हि को रक़म की अदाईगी करते हैं एसी सूरत में आप को दोगनी रक़म की अदाईगी नहीं करनी पड़ेगी !
” इमदादे रोहानी ” हदयह लेती है
शुरू अमल से क़ब्ल ” इमदादे रोहानी ” को अमलयात से ताल्लुक़ जो रक़म आप अदा करते हैं वह रक़म इमदादे रोहानी आप से बह निय्यते अमली ज़कात या सदक़े के तौर पर नहीं बल्के ” इमदादे रोहानी ” को जो रक़म आप दे रहे होते हैं उस रक़म को लेते समय ” इमदादे रोहानी ” का तसव्वुर हदीये का होता है और इमदादे रोहानी हदीये हि की रक़म लेती है ” इमदादे रोहानी ” के सुपुर्द किया हुआ आप का रक़म यानी अमली ज़कात जो आप इलाज से क़ब्ल अदा करते हैं आप का वह रक़म मदरसे के हि सुपुर्द करेगा किसी ज़रूरत मन्द को नहीं या जो रक़म बह निय्यत अमली ज़कात के आप अदा करते हैं ” इमदादे रोहानी ” वह किसी ज़रूरत मन्द हि को दिया जाता है मदरसे को नहीं या इसी तरह किसी भी मुआमलात में ” इमदादे रोहानी ” आप के रक़म को ख़र्च के करने में हर तरह के क़ैद से आज़ाद होता है और रक़म ” इमदादे रोहानी ” को दे देने के बाद रक़म से ताल्लुक़ आप हक़ ए सवाल को नहीं करने के इख़्तियार से दस्तबर्दार होते हैं
रक़म की वापसी की राज़दारी
शिफा या किसी भी मुआमलात मे कामयाबी तक़दीर इलाही है इन्सान हुक्म इलाहियह के एतबार से अपने तजर्रुबात कि रोशनी मे सिर्फ कोशिश कर सकता है अलहम्दुलिल्लाह बिला शुबह इमदाद रोहानी अपनी नुक़ूशे क़ुरआनी व दुआ ए हदीस नबवि स० कि रोशनी मे आज तक बिला तादाद मरीज़ों को अल्लाह की मदद से शिफा पहुँचाने के अमल को करती हुई आ रही है लेकिन इन तमाम दौरान ए इलाज कुछ मरीज़ इमदाद रोहानी से शिफ या अपनी कामयाबी के आमाल मे नाकामी का सामनह भी किया है नाकाम होने वाली जमाअत मे कुछ को कामयाबी भी अल्लाह ने तक़दीर किया है पर इमदाद रोहानी का कामयाबी या नाकामी पर ज़र्रह बराबर भी इख़्तियार नहीं और अपनी ख़िदमात का इमदाद रोहानी आप से जो भी रक़म इमदाद रोहानी लेती है या तो वह रक़म फौरी इमदाद रोहानी से जुड़ी इदारे तक इमदाद रोहानी आप की रक़म को पहूंचा देती है या फिर जिसे इमदाद रोहानी ज़रूरत मन्द महसूस करता है उन्हें दे देती है इस तरह इमदाद रोहानी के पास आप की रक़म वक़्फ हो जाने की सूरत मे आप की रक़म की वापसी नहीं करने पर इमदाद रोहानी मजबूर है बराए महरबानी इमदाद रोहानी को गर आप किसी मुआमलात के एतबार से रक़म आप दे रहे हैं एसी सूरत इमदाद रोहानी आप की रक़म आप को वापस करने का ज़ुम्मेदार नहीं इलावा एसी सूरत मे आप अपने रक़म के ज़ाए होने का आप ख़ुद ज़िम्मेदार हैं
सहमति
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ताज़ह तरीन
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